हालात

तन्हाइयों में अक्सर गुम हो जाता हूँ
अपने आंसूं खुद ही पी जाता हूँ
तुम कहीं रुसवा न हो जाओ ए दोस्त
यही सोच कर चुप हो जाता हूँ !

जब भी सुनता हूँ नाम तेरा
दिल यह भर ही जाता है
देख न पाने की तड़प इतनी होती है
बेबसी की हदें पार कर जाता हूँ !

तुम हो किसी और की बाँहों में
मेरे तो दिल और हाथ दोनों खाली हैं
जब उन शामों की याद आती है
इन शामों में अक्सर रो जाता हूँ !

वोह सड़कें वोह मोड़ वोह मुकाम
अभी भी नाम पुकारते हैं हमारा
जाना होता है कहीं और पर
लौट लौट वहीँ पहुँच जाता हूँ !

लौटा दी हैं सब निशानियां
यादों को कैसे लौटाऊँ मैं
जब आती है कोई तारीख
यादों से तेरी टकरा जाता हूँ !!


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