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वो मुलाकात

तुमको देखते ही छूटने वाली धड़कन याद रहेगी मुझे सालों के बाद हुई जो मुलाकात वो याद रहेगी मुझे ! मुस्कुरा के तुम्हारा वो देखना अब भी कर देते हैं हलचल दिल में तुम्हारे होठों से निकले शब्द मानो फूल बरस रहे हों बगिया में ! मुझे मदहोश कर देने वाली तुम्हारी छवि याद  रहेगी  मुझे सालों के बाद हुई जो मुलाकात वो याद रहेगी मुझे !! कब से सोचा था कि दो बातें कर दिल हल्का कर लूंगा सचाई बता कर विश्वास दिला कर वापस तुम्हे बुला लूंगा ! आँखों से कही थी जो बात वो याद रहेगी मुझे सालों के बाद हुई जो मुलाकात वो याद रहेगी मुझे !! कुछ देर का वो साथ बढ़ा गया है मेरी परेशानी मन को शांत कैसे करूँ कि प्यार में ढल गयी है मेरी ज़िंदगानी ! सुलगते शोलों को हवा देने की सौगात याद रहेगी मुझे सालों के बाद हुई जो मुलाकात वो याद रहेगी मुझे !! खुदा से मांगते हुए तुम्हे ज़बान मेरी थकती नहीं औरों की तरह मैंने तो दिल औ निगाह बदली नहीं ! हमेशा रहने वाली तुम्हारी इन्तेज़ारी याद रहेगी मुझे सालों के बाद हुई जो मुलाकात वो याद रहेगी मुझे !! चाहें तुम मुझे भूल गयी हो मैं तो नहीं भूला तुम्हे हमेशा से क...

जीना चाहता हूँ मैं

ज़िन्दगी की किताब के पन्ने सूख कर हुए थे जो ज़र्फ़ भीगी पलकों से गिरा एक कतरा सुर्ख फूलों सा खिला गया ! चाहता हूँ रख दूँ यह पन्ने सामने तुम्हारे नूर ऐ नज़र कि फिर से वोह दिन जीना चाहता हूँ मैं !!

खत

अपने दिल की कलम से दर्द की स्याही में डुबो कर बेबसी के कागज़ पे बिखराया था अपनी मजबूरियों का फ़साना तुमसे की बेवफाई का सबब और अपनी रुस्वाइयों का ज़िक्र ! ज़माने से परेशान अपनी नाकामयाबियों से झूझते तुमसे दूर तुम्हारी यादों को संभालते कभी हँसते और कभी रोते समेटे थे जिसमे कुछ अलफ़ाज़ कुछ नग्मे और कुछ यूँ ही बिना लिखे सलाम जाने क्यों नहीं मिला तुम्हे वोह खत जो लिखा था हमने !!

गीली साँसें

आँखों की नमी दिल की तड़प को दबा लिया जब उनसे बाबस्ता हुए हम ! होठों की मुस्कान और गीली साँसे मगर इज़हार ए मोहब्बत रोक न पाईं !

मेरी बेटियां

जब कभी मुझे अपनी माँ याद आती हैं  मैं अपनी बेटियों की गोद में सर रख लेता हूँ।  जब कभी यह दुनिया मुझे सताती है  मैं अपनी बेटियों से बात कर लेता हूँ।  जब कभी खुश होना चाहता हूँ   मैं अपनी बेटियों की तरफ देख लेता हूँ।  जब कभी अपनी कामयाबी बताना चाहूँ  मैं अपनी बेटियों का नाम पुकार लेता हूँ।  मेरी बेटियां - मेरा अभिमान - अंशिका और अलंकृता। 

जीवन के पचास साल

जीवन के पचास साल बीत जाने पर भी है लड़कपन मेरा जैसे का तैसा! नहाते हुए बनाता हूँ साबुन के झाग से दाढ़ी मूँछ बाल और बन जाता हूँ बूढ़ा बाबा जो था काबुल से आया। चलाता हूँ गले से आवाज़ निकाल कर मोटर कार ट्रेन और जहाज़ और खुद ही हँसते हुए गिर जाता हूँ ज़मीन पर। जवान बच्चों से करता हूँ बेसिरपैर की बातें, कभी तुकबंदी कभी पुराना गाना तो कभी यूँह ही कुछ अजब आवाज़ें। ख्यालों में अब भी देखता हूँ राजा रानी की कहानी का सुखद अंजाम, पर कहानी बनाता भी मैं हूँ और राजा भी मैं। नए नए सपने बुनता हूँ  हर रात और कभी डॉक्टर कभी पुलिस तो कभी बनता हूँ डाकुओं का सरदार। कंचे, पतंग, पिठू, गिल्ली-डंडा, लूडो और छुपन-छुपाई ललचाते हैं ज्यूँ खाली पेट को मिठाई की दूकान। छुप कर खा लेता हूँ अब भी बोर्नविटा या किशमिश गर न मिले दूध को उबाल कर राबड़ी खाने का मौका। करता हूँ कोशिश अप्रैल फूल बनाने की घर पर सबको कभी पट्टी बाँध कर तो कभी रोने की एक्टिंग कर के। टीवी पर ढूंढता हूँ कार्टून फिल्में या फिर गाने पुराने वीडियो गेम्स में सुपर मारिओ मिल जाएँ तो फिर क्या बात। रामली...

पर्दादारी

कुछ तो रहने दो तस्सुवर में मेरे जिसका ज़िक्र हुआ न हो महफिलों में! कि अक्सर जज़्बात बेपर्दा होते ही मज़ाक बन जाया करते हैं !!