पराया धन

 थम गयी है शहनाई की धुन 

मेहमान भी विदा हो लिए हैं !

संभल गया है घर का सामान भी 

कुछ फिर भी बिखर सा गया है !!

ऊँगली पकड़ के मेरी चलती थी जो 

हाथ उसका किसी के हाथ में दे दिया है !

उसकी हंसी और ख़ुशी की उछाल ने 

बहते आंसुओं को भी रोक दिया है !!

बेटी पराया धन होती है पढ़ा था कहीं 

चाह के भी कब रोके से रुकी है !

मेरे घर को रोशन करती थी जो धूप 

अब उनके आँगन में फैली है !!

कन्या दान करने की रसम 

जिस किसी ने भी बनाई है !

एक पिता के दिल और आत्मा की 

उसने न कभी की सुनवाई है !!

पापा कह के जो लिपट जाती थी मेरे गले से 

उस से मिलने की उम्मीद लगायी है!

उसके जीवनसाथी संग फेरा के समय  

स्वागत के लिए बाहें फैलायीं है !!







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