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आप की याद

रूह को तडपा  रही है आप की याद दर्द बन कर छाह रही है आप की याद ! इश्क से घबरा रही है आप की याद रुकते रुकते आ रही है आप की याद ! आप हँसे वोह ज़ेर ऐ  लब  कुछ कह उठे ख्वाब से दिखला रही है आप की याद क्या करूँ ऐ दोस्त फिर आ रही है आप की याद !

मेरी नादानियाँ

पेड़ों से गिरती हुई ओस की बूँदें गालों पे मेरे जब गिरती हैं कसम है उस खुदा की तुम्हारी आँखें बहुत याद आती हैं। प्यार की कोई परिभाषा नहीं हो सकती प्यार की कोई इंतेहा कहाँ है धड़कता है जब दिल तुम्हारा धड़कन मेरे दिल की छूट जाती है। चाहा तो बहुत के लबों पे तुम्हारे हँसी सजा दूँ हमेशा के लिए यह क्या किया मैंने के हँसी संग तुम्हारी   अश्कों की संगत  साथ आती है। खुशियों की सौगात मांगी थी तुम्हारे लिए चैन की ज़िन्दगी का था शुमार हमें मैं ही बन गया वजह तुम्हारी तन्हाई का क्या क्या रंग मोहब्बत दिखलाती है।

मेरा पहला प्यार

वोह थी मेरा पहला प्यार पहली बार आँखें उसे देखती ही रह गयीं होंठ कुछ कह न पाए पर मेरी नज़र भर गयी कितना अच्छा लगता था उसके गले लग कर चुमते ही गाल किलकारियां निकलती थी मेरे मुहं से अपने हाथों से उसने खिलाया कई बार हर दर्द को सहा बराबर मेरे साथ हर ख़ुशी में साथ थी वोह मेरे वोह थी मेरा पहला प्यार . आज जब वोह मेरे साथ नहीं है सीने से लगने की प्यास बड़ी है कहाँ से लाऊं वोह एहसास वोह मुस्कान मेरे आंसूं पोंछ ले ऐसे हाथ मेरी खुशिओं पर मुझे चूमे मेरी गलतियों पर टोके . हर प्यार से पहले वो ही थी मेरी हर  तदबीर में वो ही थी दे दे कोई मेरी माँ मुझे वापस ले ले मुझसे ज़माने की हर नियामत वोही थी तो थी मेरा पहला प्यार।

अब और तब

 कुछ इस तरह से बदलती है करवट  ज़िन्दगी जैसे चुपके से सर्द मौसम बदल जाये बहार में. क्या मालूम था हमें हमारी कश्ती भी यूँ टकरा जाएगी लहरों की दीवार से. कभी सोचा ना  था ऐसा होगा के आवारगी उन दिनों की बनेगी दीवानगी इन दिनों की. और तस्सुवर में होगा उनका कब्ज़ा जिन्हें हम लाते भी न थे ख्वाबों में. कोई शख्स क्यूँ आता है ज़िन्दगी में ऐसे लौट कर, आती है साहिल पे लहरें ज्यूँ  क्या इरादा है उस खुदा का हमारी इन मुलाकातों में. सुखा पेड एक बार फिर से हरा हो जाये बिन बरसात ऐसे सिर्फ पढ़ते थे अलिफ़ लैला की किताबों में. फर्क है---------- फर्क है लेकिन उन  दिनों की मुहब्बत और आज की इस चाहत में  तब सिर्फ चाह थी उसे पाने की और अपना बना कर रखने की. आज सिर्फ यह चाह है की वोह खुश रहे, आबाद रहे. तब जलन सी होती थी अपने रकीब से अब वही रकीब कुछ अपना सा लगने लगा है. ताजुब होता है मुझे अपने ही दिल की बेवफाई पे जो अपना न हुआ उसे गैरों का बना देखने पर भी क्यूँकर सुकून है इस में.  लोग कहते हैं हम अब समझदार हो गए हैं. सही गलत का फैसला करने का ...

मेरी बेचैनी

उनसे बिछड के एक मुद्दत हुई  अब तो अनजाने लगते हैं वो रास्ते भी  ज़िन्दगी ने सब कुछ दिया हमें  उनसे ना मिल पाने की कसक भी। यूँ तो कोई शिकवा नहीं है अपने हालातों से  मिली मोहब्बत और कामयाबी भी  वोह दर्द पता नहीं क्यूँ होता है सीने में  जागते भी सोते हुए भी. कैसे हो कहाँ हो देखने की आरज़ू है बेपनाह  अपनी जान की शै पर भी  आंसूं रोक लेता हूँ दिल को समझा लेता हूँ यही सोच कर   कि मेरी तरह करार न हो जाये रुसवा तुम्हारा भी।   कभी कहीं किसी मोड़ पे ज़िन्दगी के सफ़र में  मिलो गर हम से भी  पहचान ज़रूर लेना ग़ैर्रों की इस भीड़ में  हमें भी हमारी वफ़ा भी। मेरे दोस्त जहाँ हो खुश तो हो न  सारी खुदाई  डालता है तुम्हारी झोली में मेरा रकीब भी  किसी तरह सूरत-ए -हाल  बता पाओ अपने तो  भर जाएँ दो जहाँ खुशिओं से मेरे भी।

तन्हा

मैं तन्हा , मेरा दिल तन्हा, मेरी ज़िन्दगी तन्हा  याद किसी की कर गयी  मेरी शाम तनहा तन्हा  . अनकही मेरी बातें  हो गयीं खुद तन्हा  कसक पैदा कर हो गयीं  मेरी आहें भी तन्हा  पलक से जो गिरे अश्क  वोह भी गिरे तन्हा तन्हा . मुहब्बत का साज़ छेड़कर  कर दिया मेरा गीत तन्हा  कहकहो में हो गयी  मेरी मुस्कराहट तन्हा  महफ़िल में बैठकर कह रहा हूँ  मैं ये शेर तन्हा तन्हा . कभी गिरा कभी उठा  रहता आया हूँ मैं तन्हा  बेवफाइयों से टकरा कर  हो गयी मेरी वफ़ा तन्हा  कहीं मेरे साथ हो न जाएँ  तन्हाईयाँ तन्हा तन्हा .

मेरा नाम

देखोगे तो मुझे भी अपने जैसा ही पाओगे, मगर मैं तुम्हारे जैसा नहीं हूँ। हाँ, मेरे दो हाथ, पाँव और आँखें हैं, पर मेरी इछाओं का केंद्र - मेरा दिल नहीं है। मेरी भावनाएं जो मेरी झोंपड़ी में शायद दफ़न हैं कहीं, चली आती हैं कभी कभी मेरे खोखले सीने में। कभी दुःख, कभी क्रोध, कभी लज्जा तो कभी हीनता। और ऐसा तब ज़रूर होता है जब सामने की कोठी से दूध में मलाई कम होने की आवाज़ आती है और माँ मेरे हाथ पर सूखी रोटी और नमक रखती है। हर रोज़ मेरे कदम उस ईमारत की तरफ बढ़ जाते हैं जहाँ हर रोज़ सेकड़ों बच्चे बस्ता टांगे कारों से उतरते हैं। पर जाने क्यों वह चौकीदार मुझे अन्दर नहीं जाने देता जहाँ विद्या सबका अधिकार है का नारा लगता है। मुझे वो चोकोलेट भी लुभाते हैं जो बच्चे खेलते हुए खाते हैं पर मेरा बापू उनके पापा की तरह चोकोलेट नहीं लाता है। वो तो खुद पी कर आता है। मुझे माँ पर भी बड़ा गुस्सा आता है जब वो मुझे एक ही पुरानी कमीज़ पहनने को देती है फिर माँ की फटी साड़ी देख कर चुप हो जाता हूँ और मुंह फेर कर रो लेता हूँ। जिस दिन सामने वाली कोठी से बेबी विदेश घुमने गयी थी मैं बहुत रोया था क्योंकि उसी दिन मेरी मुन्नी ब...