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जनाब मत पूछिये हद्द हमारी गुस्ताखियों की
हम आईना ज़मीन पर रख कर आस्मां कुचलते हैं



मेरा यही अंदाज़ ज़माने को खलता है
कि मेरा चिराग हवा के खिलाफ भी जलता है

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